'परिप्रेक्ष्य'

मुझे उंगली दिखाने वालों से मैं कहता हूँ,
आज तुम ऊंचाई पर हो, कल कोई और होगा।
कभी न कभी सबको जाना है,
आखिर तक साथ कौन निभाएगा?

आज कहते हो कि ये तुम्हारा मजहब है,
कल की नक्शे पे किसी और का हक होगा।
आखिर कब तक लड़वाओगे अपने इशारे पर,
कभी न कभी तो सच्चाई से पर्दा हटेगा।

ब्राह्मण हो या मौलवी हो?
इसी से तोड़ते हो ज़माने को
मजहब का टप्पा कहाँ है,
ज़रा दिखाइए सारे जहां को।

कपड़ों से करावाओगे पहेचान हमारे,
पर दबाओगे कैसे हमारे आवाज़ को?
ज़ात-पात से ना पहेचनो हमको,
इंसानियत से हराएंगे मजहब को।

उंगली दिखाना आसान है,
कभी रास्ते पे उतर कर तो देखो।
राहचला भी सलाम करेगा,
सच्चे और अच्छे इंसान को।।

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